डॉ. बी.आर. अंबेडकर को 7 नवंबर, 1900 को सतारा के राजवाड़ा स्थित प्रताप सिंह हाई स्कूल में प्रवेश मिला
भारतीय इतिहास में कुछ तिथियाँ ऐसी होती हैं जो केवल एक व्यक्ति के जीवन की घटना नहीं होतीं, बल्कि पूरे समाज के भविष्य को बदलने वाली बन जाती हैं। 7 नवंबर, 1900 ऐसी ही एक ऐतिहासिक तिथि है। इसी दिन भारत के संविधान निर्माता, भारत रत्न डॉ. बाबासाहेब भीमराव अंबेडकर को महाराष्ट्र के सतारा के राजवाड़ा स्थित प्रताप सिंह हाई स्कूल में प्रवेश दिया गया। उस समय शायद किसी ने कल्पना भी नहीं की होगी कि स्कूल में प्रवेश लेने वाला यह नन्हा बालक आगे चलकर भारत के संविधान का निर्माता बनेगा और करोड़ों वंचित, शोषित एवं पीड़ित लोगों के लिए आशा की किरण सिद्ध होगा।
उस समय उनकी आयु लगभग नौ वर्ष थी। स्कूल के प्रवेश रजिस्टर में उनका नाम “भीवा रामजी अंबेडकर” दर्ज किया गया। यह नाम आज भारतीय इतिहास की अमूल्य धरोहर का हिस्सा बन चुका है।
यह केवल एक विद्यालय में प्रवेश की घटना नहीं थी, बल्कि सामाजिक असमानता, जातिगत भेदभाव और शिक्षा से वंचित किए गए समाज के संघर्ष का एक नया अध्याय था।
पिता रामजी सकपाल का दूरदर्शी निर्णय
डॉ. बाबासाहेब अंबेडकर के पिता रामजी मालोजी सकपाल शिक्षा के महत्व को भली-भाँति समझते थे। वे जानते थे कि उस समय भारतीय समाज में जाति के आधार पर भेदभाव गहराई तक फैला हुआ था। विशेष रूप से विद्यालयों में तथाकथित अछूत विद्यार्थियों के साथ अमानवीय व्यवहार किया जाता था।
इसी कारण उन्होंने विद्यालय में प्रवेश के समय अपने पुत्र का उपनाम “सकपाल” लिखवाने के बजाय “अंबेडकर” दर्ज कराया। यह निर्णय केवल नाम बदलने का नहीं था, बल्कि अपने बेटे को शिक्षा प्राप्त करने के लिए अपेक्षाकृत कम सामाजिक बाधाओं का सामना करना पड़े, इस उद्देश्य से लिया गया एक दूरदर्शी कदम था।
हालाँकि उपनाम बदल जाने के बाद भी सामाजिक भेदभाव पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ। विद्यालय में भीमराव को अपनी जाति के कारण अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा।
शिक्षा के मंदिर में भी झेलना पड़ा भेदभाव
विद्यालय में प्रवेश मिलने के बावजूद भीमराव का छात्र जीवन आसान नहीं था। वे उस विद्यालय में पढ़ने वाले एकमात्र अछूत छात्र थे।
उन्हें अन्य विद्यार्थियों के साथ कक्षा में बैठने की अनुमति तो थी, लेकिन उन्हें हमेशा कमरे के एक कोने में फर्श पर अकेले बैठना पड़ता था। उनके लिए अलग स्थान निर्धारित था। कोई विद्यार्थी उनके पास बैठना नहीं चाहता था, न ही उनके साथ खेलता या बातचीत करता था।
प्यास लगने पर वे स्वयं पानी के बर्तन को छू भी नहीं सकते थे। यदि कोई कर्मचारी या शिक्षक दया करके पानी पिला देता तो ठीक, अन्यथा उन्हें प्यासा ही रहना पड़ता था। शिक्षा प्राप्त करने का उनका हर दिन संघर्ष, आत्मसम्मान और धैर्य की परीक्षा बन जाता था।
लेकिन इन परिस्थितियों ने उनके मनोबल को तोड़ने के बजाय और अधिक मजबूत बनाया। उन्होंने यह समझ लिया कि समाज को बदलने का सबसे बड़ा साधन शिक्षा ही है।
संघर्ष से निकला एक महान व्यक्तित्व
बचपन में मिले अपमान और भेदभाव ने भीमराव अंबेडकर के मन में शिक्षा के प्रति अद्भुत समर्पण पैदा किया। उन्होंने हर कठिनाई को चुनौती के रूप में स्वीकार किया और अध्ययन को अपना सबसे बड़ा हथियार बनाया।
आगे चलकर उन्होंने मुंबई विश्वविद्यालय, कोलंबिया विश्वविद्यालय (अमेरिका) तथा लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स जैसे विश्व-प्रसिद्ध संस्थानों से उच्च शिक्षा प्राप्त की। वे अर्थशास्त्र, कानून, राजनीति, समाजशास्त्र और संविधान निर्माण के क्षेत्र में विश्वस्तरीय विद्वान बने।
यदि 7 नवंबर 1900 को उन्हें विद्यालय में प्रवेश न मिला होता, तो शायद भारतीय इतिहास की दिशा कुछ और होती। यही प्रवेश उनके महान शैक्षिक और सामाजिक सफर की पहली सीढ़ी बना।
स्कूल रजिस्टरों में डॉ. अंबेडकर के ऐतिहासिक हस्ताक्षर आज भी सुरक्षित हैं
प्रताप सिंह हाई स्कूल का वह प्रवेश रजिस्टर आज केवल एक विद्यालय का रिकॉर्ड नहीं है, बल्कि भारत के सामाजिक इतिहास का अत्यंत महत्वपूर्ण दस्तावेज माना जाता है। इस रजिस्टर में दर्ज “भीवा रामजी अंबेडकर” का नाम और उनके हस्ताक्षर आज भी ऐतिहासिक धरोहर के रूप में सुरक्षित रखे गए हैं।
यह दस्तावेज आने वाली पीढ़ियों को यह संदेश देता है कि साधारण परिस्थितियों से निकलकर भी असाधारण उपलब्धियाँ प्राप्त की जा सकती हैं।
डॉ. अंबेडकर का विद्यालय में प्रवेश केवल उनके व्यक्तिगत जीवन की उपलब्धि नहीं था, बल्कि उस समय शिक्षा से वंचित करोड़ों दलित, पिछड़े और शोषित समाज के लिए आशा का द्वार खोलने वाला क्षण था।
इसी शिक्षा ने उन्हें आगे चलकर भारत के संविधान का मुख्य शिल्पकार बनाया। उन्होंने ऐसा संविधान तैयार किया जिसने प्रत्येक नागरिक को समानता, स्वतंत्रता, न्याय और बंधुत्व का अधिकार प्रदान किया। उनका योगदान किसी एक जाति, धर्म या वर्ग तक सीमित नहीं है, बल्कि सम्पूर्ण भारत और मानवता के लिए अमूल्य है।
7 नवंबर: विद्यार्थी दिवस का महत्व
डॉ. बाबासाहेब अंबेडकर के जीवन में शिक्षा के इसी ऐतिहासिक महत्व को देखते हुए महाराष्ट्र राज्य सरकार ने 7 नवंबर को “विद्यार्थी दिवस” (Student’s Day) के रूप में मनाने का निर्णय लिया है।
इस अवसर पर राज्य के विद्यालयों, महाविद्यालयों और शैक्षणिक संस्थानों में विभिन्न कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। विद्यार्थियों को डॉ. अंबेडकर के संघर्ष, अनुशासन, अध्ययनशीलता और शिक्षा के प्रति समर्पण से प्रेरणा लेने का संदेश दिया जाता है।
यह दिन विद्यार्थियों को यह याद दिलाता है कि शिक्षा केवल रोजगार प्राप्त करने का माध्यम नहीं, बल्कि समाज परिवर्तन और आत्मसम्मान का सबसे शक्तिशाली साधन है।
आज की पीढ़ी के लिए प्रेरणा
आज जब शिक्षा के अनेक साधन उपलब्ध हैं, तब भी डॉ. बाबासाहेब अंबेडकर का जीवन हमें यह सिखाता है कि सफलता केवल सुविधाओं से नहीं, बल्कि दृढ़ संकल्प, निरंतर अध्ययन और कठिन परिश्रम से प्राप्त होती है।
जिस बालक को विद्यालय में अकेले बैठाया जाता था, उसी ने आगे चलकर ऐसा संविधान लिखा, जिसने प्रत्येक भारतीय को समान अधिकार प्रदान किए। उनका जीवन इस बात का प्रमाण है कि परिस्थितियाँ चाहे कितनी भी कठिन क्यों न हों, शिक्षा और ज्ञान व्यक्ति के जीवन की दिशा बदल सकते हैं।
निष्कर्ष:
7 नवंबर, 1900 भारतीय शिक्षा और सामाजिक न्याय के इतिहास की एक अविस्मरणीय तिथि है। यह दिन केवल डॉ. बाबासाहेब अंबेडकर के स्कूल में प्रवेश का दिन नहीं, बल्कि उस क्रांति की शुरुआत का प्रतीक है जिसने शिक्षा को सामाजिक परिवर्तन का सबसे बड़ा माध्यम बना दिया। आज भी प्रताप सिंह हाई स्कूल का वह प्रवेश रजिस्टर हमें यह याद दिलाता है कि एक विद्यार्थी का पहला कदम पूरे राष्ट्र का भविष्य बदल सकता है।
डॉ. बाबासाहेब अंबेडकर का जीवन प्रत्येक विद्यार्थी के लिए प्रेरणा है कि ज्ञान, परिश्रम और आत्मविश्वास के बल पर किसी भी बाधा को पार किया जा सकता है। इसलिए हमें उनके शिक्षा संबंधी संदेश को अपने जीवन में अपनाना चाहिए।
“शिक्षा बाघिन का दूध है और जो इसे पीएगा वह बाघ की तरह गुर्राएगा।”
— भारत रत्न डॉ. बाबासाहेब अंबेडकर








