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ई.वी. रामासामी पेरियार के मूल और प्रमाणित विचार: सामाजिक न्याय और तर्कवाद का दस्तावेज

ई.वी. रामासामी पेरियार के मूल और प्रमाणित विचार: सामाजिक न्याय और तर्कवाद का दस्तावेज
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भारतीय समाज-सुधार आंदोलन के उन प्रमुख विचारकों में से थे, जिन्होंने जाति-व्यवस्था, सामाजिक असमानता, अंधविश्वास और जन्म के आधार पर ऊँच-नीच के विरुद्ध मुखर होकर आवाज़ उठाई। उनका मानना था कि समाज में समानता और सम्मान तभी स्थापित हो सकता है, जब मनुष्य तर्क, विवेक और आत्मसम्मान के आधार पर अपने जीवन और सामाजिक व्यवस्था को देखे।

पेरियार के विचारों को लेकर आज भी व्यापक चर्चा होती है। इसलिए इस लेख में प्रस्तुत विचारों को उनके मूल भाषणों, लेखों और उपलब्ध ऐतिहासिक स्रोतों से प्रमाणित रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया है, ताकि पाठक उनके विचारों को संदर्भ सहित समझ सकें।

आइए पढ़ते हैं ई.वी. रामासामी पेरियार के मूल और प्रमाणित विचार, जो सामाजिक समानता, आत्मसम्मान, तर्कवाद और जाति-विरोधी चिंतन पर केंद्रित हैं।

“पूँजीपति कौन हैं? यदि वे मजदूरी में दो आना बढ़ाते हैं, तो वस्तुओं की कीमत चार आना बढ़ा देंगे और उन्हीं मजदूरों को वे वस्तुएँ अधिक कीमत पर खरीदने के लिए मजबूर करेंगे। वे दाएँ हाथ से जो देते हैं, उसे बाएँ हाथ से छीन लेते हैं।

  • “तर्कवाद, विज्ञान या अनुभव पर आधारित न होने वाला कोई भी विरोध, देर-सबेर धोखाधड़ी, स्वार्थ, झूठ और षड्यंत्रों को उजागर कर देगा।”
  • “सोचने में ही बुद्धिमत्ता है। सोच का सबसे प्रभावी हथियार तर्कवाद है।”
  • “मनुष्य को केवल इसलिए किसी बात को स्वीकार नहीं करना चाहिए कि वह परंपरा से चली आ रही है; उसे तर्क और विवेक से परखना चाहिए।”
  • “यदि किसी व्यक्ति में आत्मसम्मान और वैज्ञानिक ज्ञान नहीं है, तो केवल उपाधियाँ प्राप्त करने या धन इकट्ठा करने का कोई लाभ नहीं है।”
  • “ज्ञान की खोज कीजिए। आत्मसम्मान विवाह ही आधुनिक समय के अनुकूल विवाह हैं।”
  • “सभी मनुष्य जन्म से समान हैं; इसलिए केवल ब्राह्मणों को सर्वोच्च और दूसरों को नीचा कहना निरर्थक है।”
  • “गरीबी का मूल कारण समाज में पूँजीपतियों का अस्तित्व है। यदि समाज में अमीर लोग न हों, तो गरीबी भी नहीं होगी।”
  • “जातियों ने लोगों को पीछे धकेला है। जातियाँ विनाश को बढ़ाती हैं और समाज को नीचे गिराती हैं।”
  • “जाति के आधार पर किसी को नीचा समझना या उसे कोई तुच्छ काम करने के लिए मजबूर करना क्यों उचित होना चाहिए?”
  • “समाज की प्रगति तभी संभव है, जब मनुष्य जाति, धर्म और जन्म के आधार पर होने वाले भेदभाव से मुक्त होकर आत्मसम्मान के साथ जीवन जी सके।”
  • “ईश्वर में विश्वास ने मनुष्य की बुद्धि को नष्ट किया है।”
  • “धार्मिक व्यक्ति से तर्कसंगत विचार की अपेक्षा नहीं की जा सकती; वह पानी में हिलते हुए लट्ठे के समान है।”
  • “ईश्वर, धर्म और शास्त्रों के नाम पर लोगों को धोखा देना बंद करो और तर्कवाद तथा मानवतावाद के लिए स्थान दो।”
  • “हमारा देश तभी स्वतंत्र माना जाएगा, जब गाँवों के लोग ईश्वर, धर्म, जाति और अंधविश्वासों से पूरी तरह मुक्त हो जाएँ।”
  • “मूर्तियाँ, अज्ञानता को बढ़ावा देने वाले वेद, उपनिषद, मनुस्मृति, भारतम् और अन्य ऐसे साहित्य, जो लोगों को अंधविश्वास और मूर्खता की ओर ले जाते हैं, उन्हें हमारी तमिलनाडु की सीमाओं से बाहर कर दिया जाएगा।”
  • “विवाह जोड़े की अपनी इच्छाओं के आधार पर होना चाहिए। उनके हृदयों का आपस में जुड़ना ही विवाह का आधार होना चाहिए।”
  • “हम केवल इतना ही कह सकते हैं कि इस देश में अविवाहित लड़की को उन महिलाओं की तुलना में अधिक स्वतंत्रता प्राप्त है, जो वैवाहिक जीवन के बंधन में बंध जाती हैं।”
  • “आम आदमी सोचता है कि विवाह किसी व्यक्ति को अपना काम करने के लिए नियुक्त करने जैसा है। पति भी ऐसा ही सोचता है! हर कोई यही सोचता है कि लड़की परिवार में काम करने के लिए आ रही है।”
  • “यदि हम मंदिरों की संपत्ति और मंदिरों से होने वाली आय को नई औद्योगिक इकाइयाँ शुरू करने में लगा सकें, तो न कोई भिखारी रहेगा, न कोई अशिक्षित व्यक्ति और न ही कोई निम्न सामाजिक स्थिति वाला मनुष्य। एक ऐसी समाजवादी व्यवस्था स्थापित होगी।”
  • “सूद पर पैसा उधार देना एक घृणित पेशा है। यदि इसे किसी और नाम से पुकारना हो, तो इसे कानूनी लूट कहा जा सकता है।”
  • “गाँव का सुधार केवल सड़कों की सफाई करने, स्कूलों का निर्माण करने और मठों की पूजा करने तक सीमित नहीं है। यह केवल त्योहार मनाने का नाम भी नहीं है।”

Conclusion:

ई.वी. रामासामी पेरियार के विचारों का केंद्र केवल किसी एक समुदाय या व्यवस्था की आलोचना करना नहीं था, बल्कि सामाजिक समानता, आत्मसम्मान, तर्कशीलता और मानव गरिमा को स्थापित करना था। उन्होंने लोगों से परंपराओं और मान्यताओं को केवल इसलिए स्वीकार न करने का आग्रह किया क्योंकि वे पुरानी हैं, बल्कि उन्हें तर्क और विवेक की कसौटी पर परखने की बात कही।

उनके विचारों से सहमत होना या असहमत होना पाठक का अपना अधिकार है, लेकिन उनके मूल विचारों को उनके ऐतिहासिक संदर्भ और प्रमाणित स्रोतों के आधार पर समझना आवश्यक है। यही दृष्टिकोण हमें पेरियार के सामाजिक और वैचारिक योगदान का अधिक संतुलित मूल्यांकन करने में मदद करता है।

आपको पेरियार के इन विचारों में से कौन-सा विचार सबसे महत्वपूर्ण लगा? अपने विचार नीचे कमेंट में जरूर साझा करें।




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