भारतीय इतिहास में कई ऐसे युद्ध हुए हैं जिन्होंने सत्ताओं को बदला, लेकिन 1 जनवरी 1818 को लड़ा गया ‘भीमा कोरेगांव का युद्ध’ एक ऐसा अनूठा संघर्ष था जिसने भारत के सामाजिक ताने-बाने और चेतना को हमेशा के लिए बदल दिया। पुणे से लगभग 16 किलोमीटर दूर भीमा नदी के किनारे बसा कोरेगांव गाँव एक ऐतिहासिक महासंग्राम का गवाह बना। यह युद्ध केवल दो सेनाओं के बीच का सैन्य संघर्ष नहीं था, बल्कि इसे इतिहास में सामाजिक असमानता और आत्मसम्मान की लड़ाई के रूप में देखा जाता है।
भीमा कोरेगांव युद्ध की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
यह घटना तीसरे एंग्लो-मराठा युद्ध का हिस्सा थी। उस समय पुणे और उसके आसपास के क्षेत्रों पर पेशवा बाजीराव द्वितीय का शासन था। ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी भारत में अपने साम्राज्य का विस्तार कर रही थी।
इस युद्ध की सबसे विशेष बात यह थी कि कैप्टन एफ.एफ. स्टॉन्टन के नेतृत्व वाली ब्रिटिश सेना की ‘बॉम्बे नेटिव इन्फैंट्री’ टुकड़ी में मुख्य रूप से महार समुदाय के सैनिक शामिल थे। महार समुदाय को तत्कालीन सामाजिक व्यवस्था में अत्यंत प्रताड़ित और अछूत माना जाता था। इतिहासकार बताते हैं कि युद्ध से पहले महारों ने पेशवा शासकों से गरिमापूर्ण जीवन और सेना में शामिल होने की मांग की थी, जिसे ठुकरा दिया गया था। यही कारण था कि यह युद्ध महारों के लिए अपने स्वाभिमान को साबित करने का जरिया बन गया।
1 जनवरी 1818: जब 800 जांबाजों ने 28,000 की सेना को रोका
यह युद्ध सैन्य रणनीति और साहस का एक बेजोड़ उदाहरण है। एक तरफ पेशवा बाजीराव द्वितीय के नेतृत्व में लगभग 20,000 घुड़सवार और 8,000 पैदल सैनिकों (कुल 28,000) की विशाल सेना थी। दूसरी तरफ, ब्रिटिश टुकड़ी में मात्र 500 महार सैनिक, 300 घुड़सवार और 24 तोपची (कुल लगभग 834 सैनिक) शामिल थे।
संख्या बल में इतने बड़े अंतर के बावजूद, महार सैनिकों ने भीमा नदी के किनारे भूखे-प्यासे रहकर लगभग 12 घंटे तक पेशवा सेना का डटकर मुकाबला किया। महार सैनिकों के अदम्य साहस और युद्ध कौशल के आगे विशाल पेशवा सेना टिक नहीं सकी और अंततः उसे पीछे हटना पड़ा। इस जीत ने ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी को मजबूत किया और पेशवाई शासन के अंत की शुरुआत की।
विजय स्तंभ का निर्माण
इस भीषण युद्ध में ईस्ट इंडिया कंपनी के कई सैनिक शहीद हुए। उनकी बहादुरी और शहादत को सम्मानित करने के लिए अंग्रेजों ने कोरेगांव भीमा में एक ‘विजय स्तंभ’ (Victory Pillar) का निर्माण करवाया। इस संगमरमर के स्तंभ पर उन सभी वीर सैनिकों के नाम खुदे हुए हैं जिन्होंने इस लड़ाई में अपनी जान की बाजी लगाई थी, जिनमें अधिकांश नाम महार समुदाय के जांबाजों के हैं।
डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर और भीमा कोरेगांव का आधुनिक महत्व
लंबे समय तक इतिहास के पन्नों में दबे रहने के बाद, इस युद्ध को आधुनिक भारत की सामाजिक चेतना से जोड़ने का श्रेय राष्ट्रनिर्माता डॉ. भीमराव रामजी आंबेडकर को जाता है।
1 जनवरी 1927 को डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर ने पहली बार भीमा कोरेगांव के विजय स्तंभ का दौरा किया। उन्होंने इस स्तंभ पर जाकर शहीद सैनिकों को श्रद्धांजलि अर्पित की और इस दिन को दलित समुदाय के स्वाभिमान और वीरता के प्रतीक के रूप में रेखांकित किया। बाबासाहेब का मानना था कि यह जीत दिखाती है कि जब भी शोषितों को अवसर मिला, उन्होंने अपनी वीरता से इतिहास की दिशा बदल दी। तब से हर साल 1 जनवरी को देश भर से लाखों अंबेडकरवादी और न्यायप्रिय लोग इस ऐतिहासिक स्थल पर जुटते हैं।
निष्कर्ष:
भीमा कोरेगांव की लड़ाई इतिहास का वह पन्ना है जो हमें सिखाता है कि आत्मसम्मान की रक्षा के लिए लड़ा गया संघर्ष कभी निष्फल नहीं जाता। आज यह स्थान केवल एक युद्ध स्मारक नहीं है, बल्कि यह सामाजिक न्याय, समता और मानवीय गरिमा की प्रेरणा देने वाला एक जीवंत तीर्थ स्थल बन चुका है
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