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बहुजन समाज के “अंबिका मसाला” महिला औद्योगिक समूह की संस्थापक कमलाताई परदेशी का 2 जनवरी, 2024 को निधन हो गया।

बहुजन समाज के “अंबिका मसाला” महिला औद्योगिक समूह की संस्थापक कमलाताई परदेशी का 2 जनवरी, 2024 को निधन हो गया।
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अंबिका मसाला को घर-घर तक पहुंचाने में कमलाताई परदेशी का महत्वपूर्ण योगदान रहा। औपचारिक शिक्षा नहीं होने के बावजूद उन्होंने महिला बचत समूह की मदद से अंबिका इंडस्ट्रीज ग्रुप की स्थापना की और अपने व्यवसाय को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया।

63 वर्ष की उम्र में ब्लड कैंसर से पीड़ित कमलाताई परदेशी का पुणे के ससून अस्पताल में निधन हो गया। उनका अंतिम संस्कार महाराष्ट्र के पुणे जिले के दौंड तालुका स्थित खुतबाव गांव में किया गया।

खेतों में मजदूरी करने वाली कमलाताई परदेशी ने अपनी मेहनत और लगन के दम पर सफलता की नई मिसाल कायम की। उन्होंने वर्ष 2000 में रोज की मजदूरी से बचाए गए पैसों से अपनी मसाला बनाने की शुरुआत की। शुरुआत में वे अपनी झोपड़ी से मसाले तैयार करती थीं और उन्हें पुणे के सरकारी भवन के सामने बेचती थीं।

लोगों को उनके मसालों का स्वाद पसंद आया, जिससे अंबिका मसाला की मांग लगातार बढ़ती गई। इसके बाद उनके उत्पाद मुंबई की प्रदर्शनियों, बिग बाज़ार और देश के कई अन्य बाजारों तक पहुंच गए। समय के साथ अंबिका मसाला एक सफल कंपनी बन गई।

कमलाताई परदेशी को उनके उत्कृष्ट कार्य के लिए कई सम्मान मिले, जिनमें आदर्श उपभोक्ता पुरस्कार भी शामिल है। उनके काम की सराहना अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी हुई। नाबार्ड की एक पहल के दौरान जर्मनी की तत्कालीन चांसलर Angela Merkel ने भी उनके कार्य की प्रशंसा की। मुलाकात के दौरान कमलाताई ने उनसे केवल एक मांग रखी—उनके उत्पादों के लिए नया बाजार उपलब्ध कराया जाए। इसके बाद अंबिका मसाला को जर्मनी के बाजार तक पहुंचने का अवसर मिला।

बाद में Supriya Sule ने भी कमलाताई का सहयोग किया और उनके उत्पादों को मुंबई के प्रमुख बाजारों तक पहुंचाने में मदद की। उनकी मेहनत और संघर्ष आज भी लाखों महिलाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत है।

आज अंबिका मसाला देश का एक जाना-पहचाना और भरोसेमंद ब्रांड है। इसकी नींव कमलाताई परदेशी ने अपनी मेहनत, ईमानदारी और संघर्ष के बल पर रखी। छोटी शुरुआत से उन्होंने अपने व्यवसाय को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया।

इतनी बड़ी सफलता मिलने के बाद भी कमलाताई ने कभी अपनी सादगी नहीं छोड़ी। उन्होंने अपने साथ काम करने वाली कई महिलाओं के लिए अच्छे घर बनवाने में मदद की, लेकिन स्वयं हमेशा साधारण घर में ही रहीं। वे रोज़ अपने घर से फैक्ट्री तक पैदल जाती थीं। उनकी सादगी, मेहनत और जमीन से जुड़ा स्वभाव ही उन्हें लोगों के बीच खास बनाता था।

कमलाताई शंकर परदेशी महाराष्ट्र के पुणे जिले के दौंड तालुका स्थित खुतबाव गांव की एक साधारण महिला थीं। वे खेतों में मजदूरी करती थीं, लेकिन उनके मन में हमेशा कुछ बड़ा करने का सपना था। उनका मानना था कि केवल खेती-मजदूरी करके परिवार का भविष्य नहीं बदला जा सकता।

कमलाताई अधिक पढ़ी-लिखी नहीं थीं, लेकिन उनमें आत्मविश्वास, मेहनत और आगे बढ़ने की इच्छा थी। उन्होंने समझ लिया था कि जीवन में बदलाव लाने के लिए अपना काम शुरू करना जरूरी है। इसी सोच के साथ उन्होंने अपने गांव की महिलाओं को एकजुट किया और ‘अंबिका महिला स्वयं सहायता समूह’ की शुरुआत की।

कुछ हजार रुपये की छोटी-सी पूंजी से इस समूह ने मसाला बनाने का काम शुरू किया। शुरुआत आसान नहीं थी, लेकिन कमलाताई और उनकी साथियों ने हार नहीं मानी। उनकी मेहनत और गुणवत्ता के कारण अंबिका मसाला धीरे-धीरे लोगों की पसंद बन गया।

कमलाताई अक्सर कहा करती थीं कि केवल शिक्षा ही नहीं, बल्कि जीवन के अनुभव और मेहनत भी इंसान को आगे बढ़ना सिखाते हैं। उनका मानना था कि यदि वे और गांव की अन्य महिलाएं केवल खेतों में मजदूरी करती रहतीं, तो उनका जीवन कभी नहीं बदलता। इसलिए उन्होंने जोखिम उठाया, नया रास्ता चुना और हजारों महिलाओं के लिए आत्मनिर्भरता की मिसाल बन गईं।

वर्ष 2004 में कमलाताई परदेशी को महिला स्वयं सहायता समूह (बचत समूह) के बारे में जानकारी मिली। उन्हें लगा कि अगर गांव की महिलाएं मिलकर काम करें, तो वे अपना छोटा-सा व्यवसाय शुरू कर सकती हैं। इसी सोच के साथ उन्होंने 10 अन्य महिलाओं को जोड़कर अंबिका महिला स्वयं सहायता समूह का गठन किया।

समूह की हर महिला हर महीने 100 रुपये बचत करती थी। केवल तीन महीने में सभी महिलाओं ने कृषि मजदूरी और निराई-गुड़ाई से करीब 3,500 रुपये जमा कर लिए। यही छोटी-सी पूंजी आगे चलकर अंबिका मसाला उद्योग की पहली नींव बनी।

इसके बाद महिलाओं ने मिर्च और अन्य मसालों का कच्चा माल खरीदा और मसाला बनाने का काम शुरू किया। उस समय ग्रामोद्योग एवं खादी विभाग मसाला निर्माण का प्रशिक्षण देता था, लेकिन कमलाताई और उनके समूह की अधिकांश महिलाएं अशिक्षित होने के कारण प्रशिक्षण के लिए पात्र नहीं थीं।

हार मानने के बजाय उन्होंने एक ऐसी महिला से मसाला बनाने की कला सीखी, जिसने पहले यह प्रशिक्षण लिया था। फिर वही ज्ञान उन्होंने अपने समूह की अन्य महिलाओं को भी सिखाया। इसके बाद एक छोटी-सी झोपड़ी में मसाला बनाने का काम शुरू हुआ। यही छोटी शुरुआत आगे चलकर अंबिका मसाला को एक सफल और लोकप्रिय ब्रांड बनाने की नींव साबित हुई।

मसाला तैयार हो गया था, लेकिन अब सबसे बड़ी चुनौती उसे ग्राहकों तक पहुंचाने की थी। कमलाताई परदेशी और उनके साथ काम करने वाली महिलाओं में से किसी के पास भी बिक्री या व्यापार का कोई अनुभव नहीं था। उनके सामने सबसे बड़ा सवाल था कि मसाला किसे और कैसे बेचा जाए।

कमलाताई का मानना था कि व्यवसाय की असली सीख अनुभव से मिलती है। शुरुआत में उन्हें यह भी नहीं पता था कि मसालों की पैकिंग कैसी होनी चाहिए और उनकी मार्केटिंग कैसे की जाए। पहले उन्होंने साधारण पैकिंग में 50 ग्राम के मसाले के पैकेट तैयार किए और उन्हें तहसील कार्यालय तथा पंचायत समिति के बाहर बेचना शुरू किया।

शुरुआत में कई लोग मसाला देखकर आगे बढ़ जाते थे, लेकिन जिन्होंने इसे खरीदा और इस्तेमाल किया, उन्होंने इसकी गुणवत्ता की तारीफ की। ग्राहकों ने पैकिंग और प्रस्तुति को बेहतर बनाने के लिए कई सुझाव भी दिए। कमलाताई ने उन सुझावों को अपनाया, पैकिंग में सुधार किया और अपने उत्पाद पर आकर्षक स्टीकर लगवाए।

धीरे-धीरे अंबिका मसाला की पहचान बनने लगी। अच्छी गुणवत्ता और ग्राहकों के भरोसे के कारण इसकी मांग बढ़ती गई और यही छोटा प्रयास आगे चलकर एक सफल ब्रांड की नींव बना।

जैसे-जैसे अंबिका मसाला की पहचान बढ़ने लगी, कमलाताई परदेशी ने अपने कारोबार का विस्तार करने का फैसला किया। उन्होंने यवत, भरतगांव और खुतबाव सहित आसपास के क्षेत्रों के कई महिला स्वयं सहायता समूहों को एक साथ जोड़ा। धीरे-धीरे करीब 108 महिलाएं इस पहल का हिस्सा बन गईं।

इन सभी समूहों को संगठित करने के लिए अंबिका औद्योगिक सहकारी समिति का गठन किया गया। इसका उद्देश्य उत्पादन बढ़ाना, बिक्री का विस्तार करना और अधिक महिलाओं को रोजगार के अवसर उपलब्ध कराना था। कारोबार बढ़ाने के लिए समिति ने राष्ट्रीय बैंक से ऋण भी लिया।

इसके बाद अंबिका मसाला की पहुंच तेजी से बढ़ने लगी। पहले पुणे और आसपास के क्षेत्रों में लोकप्रिय हुआ यह ब्रांड धीरे-धीरे मुंबई के बाजार तक पहुंच गया। कमलाताई और उनकी साथी महिलाओं ने दादर जैसे व्यस्त बाजारों में स्वयं जाकर मसाले बेचे। ग्राहकों ने उनके उत्पादों को पसंद किया और बार-बार खरीदना शुरू किया।

मुंबई में बढ़ती मांग को देखते हुए नियमित रूप से मसाले की खेप भेजी जाने लगी। बेहतर पैकिंग और गुणवत्ता के कारण ग्राहकों का भरोसा बढ़ा और फोन पर भी ऑर्डर आने लगे। बाद में कूरियर के माध्यम से मसाले सीधे ग्राहकों के घरों तक पहुंचाए जाने लगे। इसी तरह अंबिका मसाला एक छोटे गांव से निकलकर महाराष्ट्र के प्रमुख बाजारों में अपनी पहचान बनाने में सफल रहा।

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अंबिका मसाला को मुंबई से मिली बड़ी पहचान, हर सप्ताह मिलने लगे लाखों रुपये के ऑर्डर

अंबिका मसाला की गुणवत्ता और बढ़ती लोकप्रियता ने जल्द ही इसे मुंबई के बड़े बाजारों तक पहुंचा दिया। सांसद Supriya Sule के सहयोग से अंबिका मसाला को बिग बाज़ार में प्रदर्शित करने का अवसर मिला। ग्राहकों ने मसालों की गुणवत्ता और स्वाद को खूब पसंद किया।

इसका परिणाम यह हुआ कि अंबिका मसाला को करीब 2.5 लाख रुपये का पहला बड़ा ऑर्डर मिला। इसके बाद हर सप्ताह इसी स्तर के ऑर्डर मिलने लगे। मुंबई के कई मॉल और बड़े स्टोर हर महीने लगभग 3 से 3.5 लाख रुपये के अंबिका मसाले खरीदने लगे। धीरे-धीरे महाराष्ट्र के साथ-साथ अन्य राज्यों से भी ऑर्डर आने शुरू हो गए।

आज अंबिका औद्योगिक सहकारी समिति करोड़ों रुपये के कारोबार तक पहुंच चुकी है। एक छोटी-सी झोपड़ी से शुरू हुआ यह सफर अब देश के कई शहरों और विदेशों तक पहुंच चुका है।

हालांकि, कमलाताई परदेशी का मानना था कि सफलता के साथ नई चुनौतियां भी आती हैं। बड़े ऑर्डर पूरे करने के लिए पर्याप्त जगह और आधुनिक मशीनों की जरूरत थी। इसके बावजूद उन्होंने कभी हार नहीं मानी। उनका विश्वास था कि अच्छी गुणवत्ता, सही मार्केटिंग और ग्राहकों के भरोसे के दम पर हर चुनौती को पार किया जा सकता है। यही सोच अंबिका मसाला की सफलता की सबसे बड़ी ताकत बनी।

कमलाताई परदेशी केवल एक सफल उद्यमी ही नहीं थीं, बल्कि एक दयालु, सरल और प्रेरणादायी व्यक्तित्व की धनी भी थीं। उन्होंने अपने संघर्ष, मेहनत और आत्मविश्वास के बल पर यह साबित किया कि सीमित संसाधन और कम शिक्षा भी सफलता की राह में बाधा नहीं बन सकते। उन्होंने न केवल अंबिका मसाला जैसा सफल ब्रांड बनाया, बल्कि सैकड़ों महिलाओं को आत्मनिर्भर बनने का अवसर भी दिया। उनका जीवन आने वाली पीढ़ियों, विशेषकर महिलाओं के लिए हमेशा प्रेरणा का स्रोत बना रहेगा।

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