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भारतीय पार्श्व गायन और भीम गीत आंदोलन: मुख्यधारा के कलाकारों के चयन का एक विश्लेषणात्मक अध्ययन

भारतीय पार्श्व गायन और भीम गीत आंदोलन: मुख्यधारा के कलाकारों के चयन का एक विश्लेषणात्मक अध्ययन
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स्वर साम्रादिनी लता मंगेशकर, जिन्हें “मेलोडी की रानी,” “भारत की कोकिला,” और “वॉयस ऑफ द मिलेनियम” कहा जाता है, एक अविश्वसनीय गायिका थीं। लता मंगेशकर एक भारतीय पार्श्व गायिका थीं। उनका जन्म “हेमा मंगेशकर” के रूप में हुआ था और वे 28 सितंबर, 1929 से 6 फरवरी, 2022 तक जीवित रहीं। उन्हें भारतीय उपमहाद्वीप के सर्वश्रेष्ठ और सबसे महत्वपूर्ण गायकों में से एक माना जाता है। दक्षिण एशियाई लोगों को सीमाओं के पार एक साथ बांधने वाली चीजों में से एक उनकी आवाज़ थी। आठ दशक के करियर के दौरान, भारतीय संगीत उद्योग में उनके योगदान के लिए उन्हें “क्वीन ऑफ़ मेलोडी,” “नाइटिंगेल ऑफ़ इंडिया,” और “वॉयस ऑफ़ द मिलेनियम” जैसी सम्मानजनक उपाधियाँ मिलीं है।

हालाँकि लता मंगेशकर को पूरे भारतीय समुदाय से इतना प्यार और स्नेह मिला था, लेकिन अपने पूरे जीवन में उन्होंने दलित समुदाय के समाज सुधारक जैसे डॉ.बी.आर अम्बेडकर, महात्मा ज्योतिराव फुले, सावित्रीबाई फुले और गाडगे बाबा, पेरियार पर कभी एक भी गाना नहीं गाया। लता मंगेशकर हमेशा विनम्रतापूर्वक उन पर गाना गाने से मना कर देती थीं। हालाँकि, लता मंगेशकर का संगीत सफर मुख्य रूप से शास्त्रीय, देशभक्ति और फिल्मों के पारंपरिक गीतों के इर्द-गिर्द केंद्रित रहा। हालाँकि यह भी सच है कि उनकी छोटी बहन आशा मंगेशकर (आशा भोसले) ने मराठी में डॉ. बी.आर.अम्बेडकर पर बहुत सारे गाने गाए हैं।

लता मंगेशकर के पिता “दीनानाथ मंगेशकर” मराठी और कोकणी थिएटर में शास्त्रीय गायक,संगीतकार और अभिनेता के रूप में काम करते थे। वह स्थानीय मराठी नाटक में भी भाग लेते। वह ज्यादातर हारमोनियम बजाना और गाने गाना पसंद करते थे। दीनानाथ मंगेशकर के पिता “गणेश भट्ट भिकोबा” (भीखंभट्ट) नवाथे हार्डिकर (अभिषेकी), एक करहड़े ब्राह्मण थे, जो गोवा के प्रसिद्ध “मंगेशी मंदिर” मंदिर में पुजारी के रूप में काम करते थे। दीनानाथ की मां, “येसुबाई राणे” गोवा के देवदासी समुदाय की एक महिला थीं, जो पेशेवर रूप से व्यावसायिक गायिका, वादक और नर्तकी थीं, वह गोवा के देवदासी समुदाय के मंदिर कलाकारों का एक मातृसत्तात्मक समुदायकी महिला सदस्य थीं। जो आज गोमांतक मराठा समाज के नाम से जाना जाता है। येसुबाई पारंपरिक रूप से मंगेशी मंदिर की एक कलावंत (संगीत और नृत्य की कलाकार) थीं, जो आज गोमांतक मराठा समाज के रूप में प्रतिष्ठित है। वह “दीनानाथ मंगेशकर” पिता “गणेश भट्ट भिकोबा” की सेविका भी थी। दीनानाथ के पिता का अंतिम(surname) नाम हार्डिकर था।

पंडित दीनानाथ मंगेशकर की माता येसुबाई राणे गोवा के कलावंत (देवदासी) समाज से थीं। यह समाज पुराने समय में मंदिरों में संगीत, नृत्य और दूसरी कलाओं के लिए जाना जाता था। इस समाज की महिलाएँ मंदिरों में धार्मिक और सांस्कृतिक कार्यक्रमों में अपनी कला का प्रदर्शन करती थीं। आज इस समाज को गोमांतक मराठा समाज के नाम से जाना जाता है।

येसुबाई राणे अपने समय की जानी-मानी गायिका और संगीतकार थीं। वह मंदिरों और धार्मिक कार्यक्रमों में शास्त्रीय गायन करती थीं। उनका पारिवारिक संबंध मंगेशी मंदिर के पुजारी पंडित गणेश भट्ट भिकोबा नवाथे (हर्डीकर) से था। इसी परिवार में पंडित दीनानाथ मंगेशकर का जन्म हुआ। आगे चलकर उनके परिवार ने भारतीय संगीत को लता मंगेशकर, आशा भोसले और कई महान गायक-गायिकाएँ दीं।

ऐतिहासिक जानकारी के अनुसार, पंडित दीनानाथ मंगेशकर का जन्म एक ऐसे परिवार में हुआ था, जहाँ उनके पिता करहाड़े ब्राह्मण थे और उनकी माता गोवा के कलावंत (देवदासी) समाज से थीं। उस समय अंतरजातीय संबंधों को समाज में आसानी से स्वीकार नहीं किया जाता था। इसलिए माना जाता है कि दीनानाथ मंगेशकर ने अपने लिए एक ऐसा उपनाम चुना, जो सीधे माता या पिता के उपनाम से जुड़ा न हो।

गोवा की क्षेत्रीय और सामाजिक परंपराओं के अनुसार, कलावंत (गोमांतक मराठा) समुदाय में पितृसत्तात्मक उपनामों के बजाय अक्सर भौगोलिक या मातृसत्तात्मक पहचान का उपयोग किया जाता था। किशोरावस्था में संगीत और रंगमंच की दुनिया में कदम रखते समय, दीनानाथ जी ने अपने पैतृक गाँव ‘मंगेशी’ और वहाँ के आराध्य देव भगवान मंगेश (शिव) के प्रति अगाध श्रद्धा प्रकट करते हुए स्वयं अपना उपनाम ‘मंगेशकर’ (अर्थात मंगेशी गाँव का निवासी) रख लिया। यह निर्णय गोवा की उस पारंपरिक व्यवस्था के अनुरूप था जहाँ लोग अपनी जड़ों और मातृभूमि की पहचान को अपने नाम के साथ जोड़ते थे। आगे चलकर इसी उपनाम को पूरे परिवार ने अपनाया, जो आज भारतीय संगीत जगत का सबसे प्रतिष्ठित नाम बन चुका है।

पंडित दीनानाथ मंगेशकर ने अपने माता-पिता के पारंपरिक काम की बजाय संगीत, नाटक और अभिनय का रास्ता चुना। उनकी माता येसुबाई राणे अपने समय की एक जानी-मानी शास्त्रीय गायिका, वादक और नृत्यांगना थीं। बचपन से ही दीनानाथ जी का पालन-पोषण संगीत और कला के माहौल में हुआ। यही कारण था कि उन्हें छोटी उम्र से ही गायन और अभिनय में गहरी रुचि हो गई।

अगर मंगेशकर परिवार के इतिहास को देखा जाए, तो येसुबाई राणे इस परिवार की पहली पेशेवर संगीतकार मानी जाती हैं। उन्होंने अपने संगीत और कला से परिवार में एक मजबूत नींव रखी। उनकी प्रेरणा और संगीत की विरासत को आगे बढ़ाते हुए पंडित दीनानाथ मंगेशकर एक प्रसिद्ध शास्त्रीय गायक और नाट्य कलाकार बने। बाद में इसी संगीत परंपरा को उनकी बेटियों लता मंगेशकर, आशा भोसले, उषा मंगेशकर और मीना खडीकर, तथा पुत्र हृदयनाथ मंगेशकर ने देश और दुनिया तक पहुँचाया।

लता मंगेशकर का परिवार अलग-अलग क्षेत्रों और सांस्कृतिक परंपराओं से जुड़ा हुआ था। उनके पिता पंडित दीनानाथ मंगेशकर के पिता पंडित गणेश भट्ट नवाथे (हर्डीकर) करहाड़े ब्राह्मण परिवार से थे, जबकि उनकी माता येसुबाई राणे गोवा के पारंपरिक कलावंत (आज का गोमांतक मराठा समाज) से थीं और अपने समय की जानी-मानी गायिका थीं। वहीं, लता मंगेशकर की माता माई (शेवंती) मंगेशकर का परिवार महाराष्ट्र और गुजरात के सीमावर्ती इलाके से जुड़ा था।

इसी वजह से मंगेशकर परिवार को अलग-अलग सांस्कृतिक परंपराओं का संगम माना जाता है। पंडित दीनानाथ मंगेशकर ने अपने बच्चों को शास्त्रीय संगीत की मजबूत शिक्षा दी, जबकि परिवार की दूसरी ओर गोवा की संगीत और कला की समृद्ध परंपरा भी जुड़ी हुई थी। यही कारण है कि लता मंगेशकर, आशा भोसले और उनके भाई-बहनों के संगीत में भारतीय संस्कृति की कई परंपराओं की झलक दिखाई देती है। आज मंगेशकर परिवार को किसी एक जाति या समुदाय की पहचान से नहीं, बल्कि भारतीय संगीत और संस्कृति की एक अनमोल विरासत के रूप में याद किया जाता है।

पैतृक वंश (Father’s Lineage): पितृपक्ष के आधार पर लता मंगेशकर का परिवार करहाड़े ब्राह्मण (Karhade Brahmin) परंपरा से संबंध रखता है। उनके दादा, पंडित गणेश भट्ट नवाथे हर्डीकर (अभिषेकी), गोवा के प्रसिद्ध मंगेशी मंदिर में एक प्रतिष्ठित करहाड़े ब्राह्मण पुजारी के रूप में अपनी सेवाएँ देते थे।

मातृवंश और पारिवारिक पृष्ठभूमि (Mother’s Lineage):
पंडित दीनानाथ मंगेशकर की माता येसुबाई राणे गोवा के पारंपरिक कलावंत समाज से थीं। आज इस समाज को गोमांतक मराठा समाज के नाम से जाना जाता है। पुराने समय में इस समाज के लोग मंदिरों में संगीत, नृत्य और दूसरी कलाओं से जुड़े हुए थे। उन्होंने गोवा की कला और संगीत की परंपरा को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

सांस्कृतिक और संगीत विश्लेषकों के बीच अक्सर यह चर्चा का विषय रहता है कि मुख्यधारा के शीर्ष कलाकारों के चयन किस प्रकार सामाजिक आंदोलनों और जन-चेतना को प्रभावित करते हैं। यदि सुर साम्राज्ञी लता मंगेशकर ने अपने युग में सामाजिक सुधारकों और महानायकों पर केंद्रित गीतों को अपनी आवाज़ दी होती, तो इसके भारतीय संगीत और सामाजिक विमर्श पर दूरगामी सांस्कृतिक प्रभाव हो सकते थे।

विशेषज्ञों का मानना है कि मुख्यधारा के दिग्गजों द्वारा गाए गए गीतों को व्यापक रेडियो और कमर्शियल मीडिया कवरेज मिलता है, जिससे हाशिए के समाजों के इतिहास और उनके संघर्षों को वैश्विक स्तर पर अधिक दृश्यता (visibility) मिलती। यह कलात्मक समावेशन सिनेमा और संगीत उद्योगों में विविधता व प्रतिनिधित्व की बहसों को एक सकारात्मक दिशा दे सकता था।

हालाँकि, ऐतिहासिक रूप से भारतीय संगीत उद्योग में व्यावसायिक पार्श्व गायन (playback singing) और सामाजिक-राजनैतिक आंदोलनों से जुड़े गीतों (जैसे महाराष्ट्र का भीम गीत आंदोलन) के बीच एक स्पष्ट विधागत अंतर (genre divide) रहा है। जहाँ मुख्यधारा का सिनेमा मुख्य रूप से व्यावसायिक कहानियों और पारंपरिक गीतों पर केंद्रित था, वहीं सामाजिक सुधारकों पर आधारित क्रांतिकारी गीतों की कमान क्षेत्रीय कलाकारों और लोक-गायकों ने संभाली, जिन्होंने अपनी कला को सीधे जन-आंदोलनों से जोड़ा।

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