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भीमा कोरेगांव महारों के स्वाभिमान और पेशवाओं के जातिवादी अहंकार के बीच की लड़ाई ।

भीमा कोरेगांव महारों के स्वाभिमान और पेशवाओं के जातिवादी अहंकार के बीच की लड़ाई ।
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पेशवाओं ने महारों की सेना में भर्ती की मांग ठुकरा दी

पेशवाओं ने महार समुदाय की उस याचिका को स्वीकार नहीं किया, जिसमें उन्होंने अपनी सेना में भर्ती होकर ईस्ट इंडिया कंपनी के खिलाफ लड़ने की इच्छा जताई थी। इस मांग को अपमानजनक तरीके से खारिज कर दिया गया। यह भी ध्यान देने योग्य है कि पेशवा शासन, छत्रपति शिवाजी महाराज के स्थापित मराठा साम्राज्य की विरासत का हिस्सा था। उस समय पेशवा सेना में अधिकांश सैनिक मराठा और मावला समुदाय से आते थे।

भीमा कोरेगांव के ऐतिहासिक महत्व को समझने के लिए पहले पेशवा को जानना जरूरी है

भीमा कोरेगांव के इतिहास को सही तरह से समझने के लिए सबसे पहले यह जानना जरूरी है कि पेशवा कौन थे। शुरुआत में पेशवा, छत्रपति (मराठा साम्राज्य के राजा) के अधीन कार्य करने वाले प्रमुख मंत्री होते थे। छत्रपति संभाजी महाराज के निधन के बाद उनके भाई राजाराम महाराज ने मराठा साम्राज्य का नेतृत्व संभाला। वर्ष 1700 में राजाराम महाराज के निधन के बाद उनकी पत्नी महारानी ताराबाई और उनके पुत्र शिवाजी द्वितीय ने मराठा साम्राज्य का नेतृत्व आगे बढ़ाया।

जातिगत भेदभाव के कारण पेशवा शासन में महार समुदाय पर मनुस्मृति आधारित नियम लागू किए गए

1707 में औरंगज़ेब की मृत्यु के बाद, उनके उत्तराधिकारी बहादुर शाह प्रथम ने छत्रपति संभाजी महाराज के पुत्र शाहूजी को कुछ शर्तों के साथ कैद से रिहा किया। रिहा होने के बाद शाहूजी ने मराठा सिंहासन पर अपना दावा किया और अपनी चाची महारानी ताराबाई तथा उनके पुत्र शिवाजी द्वितीय को चुनौती दी।

वर्ष 1713 में शाहूजी ने चितपावन ब्राह्मण बालाजी विश्वनाथ को पेशवा (प्रधानमंत्री) नियुक्त किया। समय के साथ पेशवाओं का प्रभाव लगातार बढ़ता गया और वे मराठा साम्राज्य की वास्तविक सत्ता के केंद्र बन गए। दूसरी ओर, छत्रपति का पद धीरे-धीरे केवल औपचारिक भूमिका तक सीमित रह गया।

कई ऐतिहासिक स्रोतों के अनुसार, पेशवा शासन के दौरान कठोर जातिगत भेदभाव को बढ़ावा मिला। विशेष रूप से महार समुदाय पर मनुस्मृति से प्रेरित सामाजिक नियम लागू किए गए। इन नियमों के तहत उन्हें सार्वजनिक जीवन में अनेक अपमानजनक प्रतिबंधों का सामना करना पड़ा। कहा जाता है कि महार समुदाय के लोगों को गले में मिट्टी का बर्तन (मटका) और कमर में झाड़ू बांधकर चलने के लिए मजबूर किया जाता था। गले में लटका बर्तन थूकने के लिए रखा जाता था, जबकि कमर में बंधी झाड़ू का उद्देश्य उनके पैरों के निशानों को मिटाना बताया जाता है। इन प्रथाओं को सामाजिक भेदभाव और अस्पृश्यता का प्रतीक माना जाता है।

ईस्ट इंडिया कंपनी का उद्देश्य पेशवाओं को हराकर भारत में अपना प्रभाव बढ़ाना था

उस समय ईस्ट इंडिया कंपनी भारत में अपने शासन और प्रभाव का लगातार विस्तार कर रही थी। इसके लिए पेशवा शासन को पराजित करना कंपनी की सबसे बड़ी रणनीतिक प्राथमिकताओं में से एक था। इसलिए अंग्रेजों ने पेशवाओं के खिलाफ मजबूत सैन्य तैयारी शुरू की।

इसी दौरान महार समुदाय ने पेशवा सेना में भर्ती होकर ईस्ट इंडिया कंपनी के विरुद्ध लड़ने की इच्छा जताई, लेकिन पेशवाओं ने उनकी इस मांग को स्वीकार नहीं किया। इसके बाद जब अंग्रेजों को इस स्थिति की जानकारी मिली, तो उन्होंने महार समुदाय के लोगों को अपनी सेना में भर्ती होने का अवसर दिया। ब्रिटिश सेना में उन्हें सैनिक के रूप में भर्ती किया गया और सेवा के लिए अपेक्षाकृत समान नियमों और शर्तों के तहत काम करने का अवसर मिला। यही घटनाक्रम आगे चलकर भीमा कोरेगांव के युद्ध की पृष्ठभूमि बना।

पेशवाओं और ईस्ट इंडिया कंपनी के बीच भीमा कोरेगांव का संघर्ष

1 जनवरी 1818 को भीमा कोरेगांव में पेशवा बाजीराव द्वितीय की सेना और ईस्ट इंडिया कंपनी की बॉम्बे नेटिव इन्फैंट्री के बीच एक महत्वपूर्ण युद्ध हुआ। पेशवा पक्ष के पास लगभग 20,000 घुड़सवार और 8,000 पैदल सैनिक थे। दूसरी ओर, ईस्ट इंडिया कंपनी की टुकड़ी संख्या में बहुत छोटी थी, जिसमें लगभग 500 महार सैनिकों सहित विभिन्न समुदायों के सैनिक शामिल थे।

संख्या में कम होने के बावजूद ईस्ट इंडिया कंपनी की टुकड़ी ने बहादुरी से मुकाबला किया। इस संघर्ष में महार सैनिकों ने भी असाधारण साहस और वीरता का परिचय दिया। अंततः पेशवा सेना पीछे हट गई और कुछ ही समय बाद पेशवा शासन का अंत हो गया।

इस युद्ध की स्मृति में भीमा नदी के किनारे विजय स्तंभ का निर्माण किया गया, जिस पर युद्ध में शहीद हुए सैनिकों के नाम अंकित हैं। यह स्मारक आज भी उस ऐतिहासिक संघर्ष और सैनिकों के साहस की याद दिलाता है।

यह भी ध्यान देने योग्य है कि इतिहासकार इस युद्ध की प्रकृति को लेकर अलग-अलग मत रखते हैं। सामान्यतः इसे पेशवा शासन और ईस्ट इंडिया कंपनी के बीच हुआ युद्ध माना जाता है। इसलिए इसे केवल मराठों और महारों के बीच का संघर्ष या केवल मराठों और अंग्रेजों के बीच की लड़ाई कहना ऐतिहासिक रूप से पूर्ण और सटीक व्याख्या नहीं माना जाता है, क्योंकि दोनों पक्षों की सेनाओं में विभिन्न समुदायों के सैनिक शामिल थे।

भीमा कोरेगांव की लड़ाई: आत्मसम्मान और जातिगत भेदभाव के विरुद्ध संघर्ष

भीमा कोरेगांव का युद्ध केवल दो सेनाओं के बीच लड़ा गया सैन्य संघर्ष नहीं था, बल्कि इसे अनेक लोग सामाजिक न्याय, आत्मसम्मान और जातिगत भेदभाव के विरुद्ध प्रतिरोध के प्रतीक के रूप में भी देखते हैं। इस युद्ध में एक ओर पेशवा शासन था, जिस पर कठोर जाति व्यवस्था लागू करने के आरोप लगाए जाते हैं, और दूसरी ओर ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना थी, जिसमें महार समुदाय के सैनिक भी बड़ी संख्या में शामिल थे।

दलित समाज के लिए भीमा कोरेगांव का संघर्ष विशेष महत्व रखता है। उनके दृष्टिकोण से यह केवल एक सैन्य जीत नहीं, बल्कि उस सामाजिक व्यवस्था के खिलाफ प्रतिरोध था, जिसने महार समुदाय सहित कई वंचित जातियों को सम्मान, समान अवसर और सैन्य सेवा जैसे अधिकारों से वंचित रखा था।

इतिहास के अनुसार, महार समुदाय ने पहले पेशवा सेना में भर्ती होकर लड़ने की इच्छा व्यक्त की थी, लेकिन उनकी मांग स्वीकार नहीं की गई। इसके बाद उन्होंने ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना में भर्ती होकर युद्ध में भाग लिया। इस कारण भी यह संघर्ष महार समुदाय के आत्मसम्मान और अपनी क्षमता को सिद्ध करने के प्रतीक के रूप में देखा जाता है।

हालांकि, यह भी ध्यान रखना आवश्यक है कि इतिहासकार इस युद्ध की अलग-अलग व्याख्या करते हैं। सैन्य इतिहास की दृष्टि से यह पेशवा शासन और ईस्ट इंडिया कंपनी के बीच हुआ युद्ध था, जबकि सामाजिक इतिहास में इसे जातिगत भेदभाव और सामाजिक समानता की लड़ाई के रूप में भी देखा जाता है। इसी कारण भीमा कोरेगांव का इतिहास आज भी सामाजिक और ऐतिहासिक चर्चा का महत्वपूर्ण विषय बना हुआ है।

डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर ने दलित समाज को भीमा कोरेगांव जाकर वीर सैनिकों को श्रद्धांजलि देने के लिए प्रेरित किया

डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर ने भीमा कोरेगांव के विजय स्तंभ का दौरा किया और इस ऐतिहासिक स्थल के महत्व को समाज के सामने रखा। उन्होंने दलित समाज से आह्वान किया कि वे उन वीर सैनिकों के साहस और बलिदान को याद रखें, जिन्होंने अन्याय और सामाजिक भेदभाव के विरुद्ध संघर्ष में अपनी भूमिका निभाई।

इसी प्रेरणा के कारण हर वर्ष 1 जनवरी को लाखों लोग भीमा कोरेगांव स्थित विजय स्तंभ पर पहुंचकर वीर सैनिकों को श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं। यह दिन अनेक लोगों के लिए आत्मसम्मान, समानता और सामाजिक न्याय के संकल्प का प्रतीक माना जाता है।

स्वतंत्रता के बाद भी सामाजिक समानता और प्रतिनिधित्व को लेकर बहस जारी रही है। दलित समुदाय के कुछ संगठनों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का मानना है कि भारतीय सशस्त्र बलों सहित कई क्षेत्रों में दलितों का प्रतिनिधित्व उनकी जनसंख्या के अनुपात में पर्याप्त नहीं है। वहीं, सेना में भर्ती की वर्तमान व्यवस्था योग्यता, शारीरिक क्षमता और निर्धारित चयन प्रक्रिया पर आधारित है। इसलिए इस विषय पर विभिन्न सामाजिक और राजनीतिक दृष्टिकोण मौजूद हैं।

महार योद्धाओं की बेहतर ताकत के कारण, अंग्रेजों ने यह लड़ाई जीत ली और पेशवाओं को परास्त कर दिया गया। कोरेगांव की लड़ाई में पांच महार अधिकारियों और बीस महार लोगों की जान चली गई।
उनके सम्मान में बनाए गए स्मारक पर शहीद हुए महारों के नाम हैं। जो नीचे सूचीबद्ध हैं:

1: गोपनाक मोठेनाक
2: शमनाक येशनाक
3: भागनाक हरनाक
4: अबनाक काननाक
5: गननाक बालनाक
6: बालनाक घोंड़नाक
7: रूपनाक लखनाक
8: बीटनाक रामनाक
9: बटिनाक धाननाक
10: राजनाक गणनाक
11: बापनाक हबनाक
12: रेनाक जाननाक
13: सजनाक यसनाक
14: गणनाक धरमनाक
15: देवनाक अनाक
16: गोपालनाक बालनाक
17: हरनाक हरिनाक
18: जेठनाक दीनाक
19: गननाक लखनाक

इस लड़ाई में महारों का नेत्रत्व करने वालों के नाम निम्न थे –
रतननाक
जाननाक
और भकनाक आदि

इनके नामों के आगे सूबेदार, जमादार, हवलदार और तोपखाना आदि उनके पदों का नाम लिखा है।

इस संग्राम में जख्मी हुए योद्धाओं के नाम निम्न प्रकार हैं –

1: जाननाक
2: हरिनाक
3: भीकनाक
4: रतननाक
5: धननाक

महार रेजिमेंट के सैनिकों की बैरी कैप्स पर आज भी इस स्तंभ का चिन्ह अंकित है, जिसका निर्माण कोरेगांव संघर्ष की याद में किया गया था। 1851 में एक अन्य सैन्य कार्यक्रम के दौरान शहीद हुए सैनिकों को ब्रिटिश सरकार द्वारा मेडल प्रदान किये गये।

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