तमिलनाडु सरकार ने स्मार्ट मीटर परियोजना को लेकर बड़ा निर्णय लेते हुए लगभग ₹20,000 करोड़ के टेंडर को रद्द कर दिया है। यह टेंडर अडानी एनर्जी सॉल्यूशंस (AESL) से जुड़ा हुआ था।
सरकार के अनुसार, कंपनी द्वारा प्रस्तुत की गई बोली अन्य राज्यों में लागू समान परियोजनाओं की तुलना में काफी अधिक थी। यदि इस प्रस्ताव को मंजूरी दी जाती, तो राज्य के बिजली विभाग और उपभोक्ताओं पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ सकता था। इसी कारण परियोजना के सभी चार पैकेजों के टेंडर निरस्त कर दिए गए।
इस फैसले के बाद राजनीतिक माहौल भी गर्म हो गया है। सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच आरोप-प्रत्यारोप का दौर जारी है। वहीं, आम जनता के बीच भी स्मार्ट मीटरों को लेकर अलग-अलग राय देखने को मिल रही है। कुछ लोग इसे बिजली व्यवस्था को अधिक आधुनिक, पारदर्शी और कुशल बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम मानते हैं, जबकि कुछ लोगों को आशंका है कि इससे भविष्य में बिजली बिलों में बढ़ोतरी हो सकती है।
तमिलनाडु सरकार ने स्पष्ट किया है कि कृषि कनेक्शनों को छोड़कर पूरे राज्य में स्मार्ट मीटर लगाने के लिए जल्द ही एक नया वैश्विक टेंडर जारी किया जाएगा। सरकार का उद्देश्य इस प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी, प्रतिस्पर्धी और किफायती बनाना है।
वित्तीय कारण: राज्य सरकार और टैंगडको (TANGEDCO) का मानना है कि इस महंगी परियोजना को लागू करने से आम जनता और राज्य के खजाने पर भारी वित्तीय बोझ पड़ता, जो पहले से ही मुफ्त बिजली योजनाओं के कारण दबाव में है।
नया टेंडर: महंगे टेंडर को ख़ारिज करते हुए सरकार ने स्पष्ट किया है कि पूरे राज्य में स्मार्ट मीटर लगाने के लिए अब एक नई और अधिक पारदर्शी वैश्विक निविदा (Global Tender) प्रक्रिया अपनाई जाएगी।
राजनीतिक घमासान: इस फैसले के बाद राज्य में तीखी राजनीतिक बहस छिड़ गई है। जहाँ एक ओर सत्ता पक्ष इसे जनहित और पारदर्शिता से जुड़ा फैसला बता रहा है, वहीं भाजपा ने इस फैसले को राज्य के बिजली सुधारों के लिए एक “बड़ी भूल” करार दिया है, उनका मानना है कि इससे बिजली निगम (TANGEDCO) को व्यावसायिक घाटा हो सकता है।
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क्या स्मार्ट मीटर बिजली उपभोक्ताओं के लिए लाभदायक साबित होंगे, या फिर इससे बिजली बिलों का बोझ बढ़ेगा?










