7 फ़रवरी: माता रमाबाई भीमराव अंबेडकर जयंती दिवस
भारत के सामाजिक न्याय आंदोलन के इतिहास में जब भी डॉ. बाबासाहेब भीमराव अंबेडकर का नाम लिया जाता है, तब उनके संघर्षपूर्ण जीवन में साथ निभाने वाली उनकी धर्मपत्नी माता रमाबाई भीमराव अंबेडकर (रमाई) का स्मरण भी अत्यंत श्रद्धा और सम्मान के साथ किया जाता है। बाबासाहेब ने अपने जीवन में जो महान उपलब्धियाँ प्राप्त कीं, उनके पीछे माता रमाबाई का त्याग, धैर्य, सेवा और अटूट विश्वास एक महत्वपूर्ण आधार था।
7 फ़रवरी को माता रमाबाई अंबेडकर की जयंती मनाई जाती है। यह दिन केवल उनके जन्म का स्मरण नहीं है, बल्कि उस महान महिला को श्रद्धांजलि देने का अवसर है, जिसने अत्यंत कठिन परिस्थितियों में अपने परिवार और बाबासाहेब का साथ निभाया। उनका जीवन त्याग, संघर्ष, सहनशीलता और निस्वार्थ प्रेम का अनुपम उदाहरण है।
रमाबाई धोत्रे (रमाबाई अंबेडकर) का जन्म 7 फ़रवरी 1898 को हुआ था
माता रमाबाई भीमराव अंबेडकर का जन्म 7 फ़रवरी 1898 को महाराष्ट्र के रत्नागिरी जिले के वनंद (Vanand) गाँव में एक अत्यंत साधारण और गरीब परिवार में हुआ था। उनका जन्म नाम रमाबाई धोत्रे (वलंगकर) था। वे 7 फ़रवरी 1898 से 27 मई 1935 तक जीवित रहीं।
यद्यपि उन्होंने औपचारिक शिक्षा प्राप्त नहीं की, लेकिन उनके जीवन की समझ, धैर्य और परिवार के प्रति समर्पण असाधारण था। बाबासाहेब अंबेडकर ने स्वयं स्वीकार किया था कि रमाबाई का प्रोत्साहन और त्याग उन्हें उच्च शिक्षा प्राप्त करने तथा अपने जीवन के महान उद्देश्यों को पूरा करने की शक्ति देता रहा।
जब बाबासाहेब विदेश में अध्ययन कर रहे थे, तब रमाबाई ने आर्थिक अभाव, पारिवारिक कठिनाइयों और सामाजिक चुनौतियों का सामना धैर्यपूर्वक किया। उन्होंने कभी भी बाबासाहेब की शिक्षा और सामाजिक मिशन में बाधा नहीं बनने दिया।
आज पूरे भारत में उन्हें प्रेमपूर्वक “रमाई” या “माता रमाई” के नाम से जाना जाता है। उनके सम्मान में अनेक विद्यालय, छात्रावास, महिला योजनाएँ, स्मारक, सार्वजनिक स्थल और संस्थानों का नाम रखा गया है। उनके जीवन पर अनेक पुस्तकें, नाटक, वृत्तचित्र और जीवनी आधारित फ़िल्में भी बनाई गई हैं।
भीकू धोत्रे और रुक्मिणी के घर जन्मी रमाबाई का बचपन अत्यंत कठिनाइयों में बीता
रमाबाई का जन्म भीकू धोत्रे (वलंगकर) और रुक्मिणी के घर हुआ। उनका परिवार अत्यंत गरीब था और जीविका के लिए कठिन परिश्रम करता था।
वे अपने भाई शंकर तथा तीन बहनों के साथ रत्नागिरी जिले के दापोली तालुका के निकट वनंद गाँव के महापुरा क्षेत्र में रहती थीं। उनके पिता हरनाई और दाभोल बंदरगाह से मछलियों की टोकरियाँ बाजार तक पहुँचाने का कार्य करते थे। सीमित आय में परिवार का पालन-पोषण करना उनके लिए अत्यंत कठिन था।
रमाबाई का बचपन अनेक दुःखों से भरा रहा। जब वे बहुत छोटी थीं, तभी उनके पिता का निधन हो गया। कुछ समय बाद उनकी माता भी इस संसार से चली गईं। माता-पिता के निधन के बाद बच्चों की जिम्मेदारी उनके चाचा वलंगकर और गोविंदपुरकर ने संभाली।
इसके बाद पूरा परिवार मुंबई आ गया और बायकुला मार्केट के आसपास रहने लगा। आर्थिक तंगी के बावजूद परिवार ने एक-दूसरे का सहारा बनकर जीवन व्यतीत किया। इन्हीं कठिन परिस्थितियों ने रमाबाई को धैर्य, सहनशीलता और संघर्ष की शक्ति प्रदान की।
1906 में डॉ. भीमराव अंबेडकर से विवाह और संघर्षमय पारिवारिक जीवन
वर्ष 1906 में मुंबई के बायकुला सब्जी बाजार में अत्यंत सादगीपूर्ण समारोह में रमाबाई का विवाह भीमराव अंबेडकर से हुआ। उस समय रमाबाई की आयु लगभग आठ वर्ष तथा भीमराव अंबेडकर की आयु लगभग पंद्रह वर्ष थी। उस समय बाल विवाह समाज में सामान्य प्रथा थी।
रमाबाई अपने पति को आदरपूर्वक “साहब” कहकर संबोधित करती थीं, जबकि बाबासाहेब उन्हें स्नेहपूर्वक “रामू” कहकर पुकारते थे।
विवाह के बाद उनका जीवन अत्यंत कठिनाइयों से भरा रहा। आर्थिक अभाव, पारिवारिक जिम्मेदारियाँ और सामाजिक भेदभाव के बीच भी रमाबाई ने कभी शिकायत नहीं की। उन्होंने बाबासाहेब को पढ़ाई जारी रखने, विदेश जाकर उच्च शिक्षा प्राप्त करने और समाज सेवा के कार्यों में पूरा सहयोग दिया।
रमाबाई और बाबासाहेब के पाँच बच्चे हुए—
- यशवंत अंबेडकर
- गंगाधर अंबेडकर
- रमेश अंबेडकर
- इंदु (पुत्री)
- राजरत्न अंबेडकर
इनमें से यशवंत अंबेडकर (1912–1977) ही वयस्क अवस्था तक जीवित रहे। अन्य चार बच्चों का अल्पायु में ही निधन हो गया। अपने बच्चों को खोने का दुःख किसी भी माता के लिए असहनीय होता है, फिर भी रमाबाई ने धैर्य नहीं खोया और बाबासाहेब का मनोबल बनाए रखा।
बाबासाहेब के संघर्ष में माता रमाई का अमूल्य योगदान
डॉ. बाबासाहेब अंबेडकर का सार्वजनिक जीवन अत्यंत व्यस्त और संघर्षपूर्ण था। वे शिक्षा, समाज सुधार, कानून, राजनीति और वंचित समाज के अधिकारों के लिए निरंतर कार्य करते रहे। ऐसे समय में घर-परिवार की लगभग पूरी जिम्मेदारी रमाबाई ने संभाली।
उन्होंने कभी अपने व्यक्तिगत कष्टों को बाबासाहेब के मार्ग की बाधा नहीं बनने दिया। जब बाबासाहेब विदेश में अध्ययन कर रहे थे, तब रमाबाई ने सीमित संसाधनों में परिवार का पालन-पोषण किया और कठिनाइयों को सहन करते हुए उनके सपनों को पूरा होने दिया।
बाबासाहेब स्वयं कई अवसरों पर स्वीकार कर चुके थे कि यदि रमाबाई का सहयोग, धैर्य और त्याग न होता, तो उनके लिए अपने महान शैक्षणिक और सामाजिक उद्देश्यों को पूरा करना अत्यंत कठिन होता।
27 मई 1935: माता रमाबाई का महापरिनिर्वाण
लगातार बीमारी और कमजोर स्वास्थ्य के कारण 27 मई 1935 को मुंबई के दादर स्थित राजगृह में माता रमाबाई अंबेडकर का निधन हो गया। उन्होंने लगभग 29 वर्षों तक बाबासाहेब के जीवन-संघर्ष में उनकी सहधर्मिणी और सबसे बड़ी सहयोगी के रूप में साथ निभाया।
रमाबाई के निधन ने बाबासाहेब को गहरा आघात पहुँचाया। उन्होंने अपने जीवन की सबसे बड़ी प्रेरणाओं में से एक को खो दिया था। बाद में बाबासाहेब ने अपने अनेक लेखों और वक्तव्यों में उनके त्याग और योगदान का सम्मानपूर्वक उल्लेख किया।
निष्कर्ष:
माता रमाबाई भीमराव अंबेडकर का जीवन त्याग, धैर्य, सेवा और समर्पण की अद्भुत मिसाल है। उन्होंने स्वयं कठिनाइयाँ झेलीं, लेकिन कभी भी बाबासाहेब के सपनों और उनके सामाजिक मिशन को कमजोर नहीं होने दिया। उनका योगदान केवल एक महान व्यक्ति की पत्नी होने तक सीमित नहीं था, बल्कि वे उस सामाजिक परिवर्तन की मौन शक्ति थीं जिसने आधुनिक भारत के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
7 फ़रवरी को उनकी जयंती हमें यह प्रेरणा देती है कि किसी भी महान परिवर्तन के पीछे अनेक ऐसे व्यक्तित्व होते हैं, जिनका त्याग इतिहास के पन्नों में कम दिखाई देता है, लेकिन जिनके बिना वह परिवर्तन संभव नहीं होता। माता रमाई का जीवन आने वाली पीढ़ियों के लिए सेवा, धैर्य, त्याग और मानवता का अमूल्य संदेश है।









